बाबा रामदेव जी: रुणीचा धाम से गूंजता भाईचारे और सामाजिक समरसता का संदेश
राजस्थान की मरुभूमि केवल वीरों, राजाओं और ऐतिहासिक किलों की धरती नहीं है, बल्कि यह संतों, लोकदेवताओं और महान तपस्वियों की कर्मभूमि भी रही है। इसी पावन धरा पर जैसलमेर जिले के पोकरण क्षेत्र के पास स्थित रुणीचा धाम आज देशभर में आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। इसे रामदेवरा के नाम से भी जाना जाता है। यह वही पवित्र स्थल है, जहां लोकदेवता बाबा रामदेव जी की समाधि स्थित है। बाबा रामदेव जी राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में श्रद्धा के साथ पूजे जाते हैं। हिंदू समाज उन्हें बाबा रामदेव के रूप में पूजता है, वहीं मुस्लिम समाज में वे रामसा पीर या रामशाह पीर के नाम से प्रसिद्ध हैं। यही वजह है कि रामदेवरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब का भी अनूठा प्रतीक माना जाता है।
1352 ईस्वी में हुआ बाबा रामदेव जी का जन्म
लोक मान्यताओं के अनुसार बाबा रामदेव जी का जन्म संवत 1409 यानी वर्ष 1352 ईस्वी में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को हुआ था। उनके पिता का नाम राजा अजमाल जी तंवर और माता का नाम मैणादेवी बताया जाता है। वे तंवर या तोमर राजपूत वंश से संबंधित थे। बचपन से ही बाबा रामदेव जी के व्यक्तित्व में असाधारण प्रतिभा और आध्यात्मिक चेतना दिखाई देने लगी थी। उनके जीवन से जुड़ी अनेक लोककथाएं और चमत्कार आज भी राजस्थान के लोकगीतों और भजनों में सुनने को मिलते हैं। इन चमत्कारों को स्थानीय भाषा में ‘परचा’ कहा जाता है। बाबा रामदेव जी ने अपने जीवन का उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेशों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव, ऊंच-नीच और छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई तथा जरूरतमंद और वंचित लोगों की सहायता को अपना धर्म माना।
रुणीचा बनी बाबा की कर्मभूमि
मान्यता है कि पोकरण क्षेत्र में भैरव नामक एक अत्याचारी शक्ति के आतंक से लोगों को मुक्ति दिलाने के बाद बाबा रामदेव जी ने रुणीचा को अपनी कर्मभूमि बनाया। यही स्थान आगे चलकर रामदेवरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रामदेवरा स्थित मंदिर बाबा रामदेव जी की आस्था का प्रमुख केंद्र है। वर्तमान मंदिर का आधुनिक स्वरूप बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के समय में विकसित हुआ। मंदिर के गर्भगृह में बाबा रामदेव जी की समाधि स्थित है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। भक्त बाबा की समाधि पर शीश नवाकर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं और श्रद्धा के साथ भजन-कीर्तन करते हैं। विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
मक्का के पांच पीरों से जुड़ी प्रसिद्ध कथा
बाबा रामदेव जी के जीवन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में मक्का से आए पांच पीरों की कथा प्रमुख है। लोक मान्यता के अनुसार बाबा की प्रसिद्धि सुनकर पांच पीर उनकी परीक्षा लेने रुणीचा पहुंचे। बाबा रामदेव जी ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। पीरों ने कहा कि वे अपने उन्हीं बर्तनों में भोजन करते हैं, जो मक्का में रह गए हैं। मान्यता है कि बाबा ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से वे बर्तन मक्का से रुणीचा मंगवा दिए। इस घटना से प्रभावित होकर पीरों ने बाबा रामदेव जी की महानता को स्वीकार किया और उन्हें रामशाह पीर या रामसा पीर की उपाधि दी। इसी वजह से मुस्लिम समाज में भी बाबा रामदेव जी के प्रति गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है।
लीला घोड़ा और कपड़े के घोड़े की परंपरा
बाबा रामदेव जी के जीवन में घोड़े का विशेष महत्व माना जाता है। लोक मान्यताओं में उनके प्रिय घोड़े का नाम ‘लीला’ बताया गया है। कहा जाता है कि बाबा इसी घोड़े पर सवार होकर जरूरतमंदों और दुखी लोगों की सहायता के लिए पहुंचते थे। एक अन्य लोककथा में उनके बचपन के कपड़े के घोड़े का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि माता द्वारा बनाए गए कपड़े के घोड़े को बाबा के स्पर्श से चमत्कारिक शक्ति प्राप्त हुई। आज भी रामदेवरा में श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर कपड़े के घोड़े चढ़ाते हैं।
रामदेवरा के प्रमुख धार्मिक स्थल
रामदेवरा केवल समाधि मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां कई ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं, जिनका संबंध बाबा रामदेव जी की लोक आस्था से जुड़ा हुआ है।
राम सरोवर मंदिर के पास स्थित प्रमुख स्थल है। श्रद्धालु इसे पवित्र मानते हैं और यहां स्नान करते हैं।
परचा बावड़ी भी आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। इससे जुड़ी कई लोक मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं।
डाली बाई की समाधि भी रामदेवरा की विशेष पहचान है। डाली बाई को बाबा रामदेव जी की अनन्य भक्त और धर्म-बहन के रूप में याद किया जाता है। उनकी समाधि के पास बने पत्थर के कंगन से जुड़ी भी अनेक धार्मिक मान्यताएं हैं।
इसके अलावा पोकरण क्षेत्र में गुरु बालीनाथ जी का धूणा भी महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि बाबा रामदेव जी ने गुरु बालीनाथ से आध्यात्मिक शिक्षा और दीक्षा प्राप्त की थी।
सामाजिक समरसता का संदेश
बाबा रामदेव जी की सबसे बड़ी पहचान उनके सामाजिक संदेश से जुड़ी है। जिस दौर में समाज जाति-पांत, छुआछूत और ऊंच-नीच जैसी कुरीतियों से जूझ रहा था, उस समय बाबा ने समानता और मानवता का संदेश दिया। उन्होंने समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को सम्मान दिया तथा यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति पर किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं है। यही विचार आज भी रामदेवरा की धार्मिक परंपरा में दिखाई देता है। रामदेवरा में हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालुओं का एक साथ आना इस सामाजिक समरसता की जीवंत मिसाल है। यही कारण है कि बाबा रामदेव जी की लोकप्रियता धर्म और जाति की सीमाओं से कहीं आगे दिखाई देती है।
भाद्रपद में लगता है विश्व प्रसिद्ध मेला
रामदेवरा में हर वर्ष भाद्रपद मास में विशाल मेले का आयोजन होता है। विशेष रूप से भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और देश के अन्य हिस्सों से श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हुए रामदेवरा पहुंचते हैं। इन श्रद्धालुओं को स्थानीय रूप से ‘जातरू’ कहा जाता है। मेले के दौरान पूरा रामदेवरा भक्ति के रंग में रंग जाता है। जगह-जगह भजन, लोकगीत और बाबा के जयकारे सुनाई देते हैं। ‘खम्मा-खम्मा हो रामा, रुणीचे रा धणिया’ जैसे पारंपरिक जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
आज भी प्रासंगिक है बाबा रामदेव जी का संदेश
बाबा रामदेव जी का जीवन केवल धार्मिक आस्था की कहानी नहीं, बल्कि मानवता, समानता और भाईचारे का संदेश भी देता है। सदियों बाद भी उनके प्रति लोगों की श्रद्धा यह बताती है कि समाज को जोड़ने वाली शिक्षाएं समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाती हैं। मरुभूमि की रेत के बीच स्थित रुणीचा धाम आज भी लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां पहुंचने वाला हर व्यक्ति बाबा रामदेव जी की समाधि के सामने नतमस्तक होकर शांति, विश्वास और मानवता का अनुभव करता है।
रामदेवरा इसलिए केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि राजस्थान की उस समृद्ध लोक परंपरा का प्रतीक है, जहां धर्म से ऊपर इंसानियत, भेदभाव से ऊपर भाईचारा और सीमाओं से ऊपर आस्था को महत्व दिया जाता है। बाबा रामदेव जी का यही संदेश आज भी रुणीचा धाम से देशभर में गूंज रहा है।
